प्रस्‍थान

...ताकि संवाद की गुंजाइश हमेशा बनी रहे

17 Posts

121 comments

राजीव ओझा

Faizabad
Year of Exp: 17 years
Age: 45 year old

Sort by:

प्यारी संग झूलत प्रीतम प्यारो

Posted On: 23 Jul, 2011  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (12 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others न्यूज़ बर्थ में

1 Comment

Page 1 of 212»

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा:

आदरणीय राजीव जी ,.सादर अभिवादन ,.. डॉ. खत्री के साथ वार्ता प्रकाशित करने के लिए बधाई अभी यमुना और गोमती में बहु पानी बहना बाकी है ,..लखनऊ में क्या होगा ?....दिल्ली से पता चलेगा ,..इस बार दिल्ली से ताकत छोड़ो ,..कहीं बेहोशी का इंजेक्शन ना मिल जाए उत्तर प्रदेश की जनता चौराहे पर कड़ी है ,...पता नहीं है कौन सा रास्ता सही है ,.. कांग्रेसी पूरे देश की जनता को ताकत के बल पर मूर्ख बना रहे हैं ,. देश और जनता लूटी जा रही थी ,.. बार बार चिल्लाने पर भी ,..ये सो रहे थे ...भला हो डॉ .सुब्रमण्यम स्वामी का जिन्होंने इनको बेपर्दा कर दिया , बड़े डाकुओं को लगातार क्यों बचाया जा रहा है ,..नंगे तो हो ही चुके हैं बेशर्मी की हद पार करते जा रहे हैं ,... इससे तो यही पता चलता है की ,...आलाकमान लूट का सूत्रधार है.. बाकी ये नेता हैं ,..सांसद हैं ,...आगे मलाई भी दिख रही है ,...इनके देश गया भाड़ में ....इनके दरबार में रौनक लगी रहे बस ,.......अरे कुछ तो शर्म करो ...भगवान् को भी जबाब देना है या नहीं ?...अमर होकर आये हो क्या ?...........................नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं ,...महामाई सबको सद्बुद्धि प्रदान करें कभी समय मिले तो मेरे ब्लाग पर भी घूम जाएँ .. http://santo1979.jagranjunction.com/

के द्वारा: Santosh Kumar Santosh Kumar

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

आदरणीय राजीव जी ,..इलेक्ट्रोनिक मीडिया द्वारा कराये गए सर्वेक्षणों का अर्थ किसी की भी समझ से बाहर है ,...आखिर इस समय सर्वेक्षणों का औचित्य क्या है ? ..देश बर्बादी की कगार पर खड़ा है ,...ऐसे में राहुल बाबा की जयकारों से किसका फायदा है ,...सभी सर्वेक्षणों के नतीजे अलग अलग हैं ..... क्या राहुल ने दो सालों से कान में नीम का तेल डाल रखा है ..उनको इस लूट का नहीं पता ,..सब जानता है ..लेकिन जब माल अपने ही घरों में जा रहा हो तो चुप रहना इस परिवार की रवायत है ,..,..परम आदरणीय राजमाता किस बीमारी से पीड़ित हैं और किस बीमारी का किससे, क्या कहाँ इलाज हो रहा है ,..कोई पत्रकार क्यों नहीं सवाल उठाता है ? कभी समय मिले तो मेरे ब्लॉग पर नजर जरूर डालिए ,....सादर आभार

के द्वारा: Santosh Kumar Santosh Kumar

के द्वारा:

ओझाजी, बाल साहित्य की हिंदी में जो कमी है, उस पर ध्यान दिला कर आपने उपकार किया है. मेरे ज़माने में पांच पत्रिकाएं ऐसी थी जिसे हम बच्चे बड़े चाव से पढ़ते थे. पराग, बाल भारती, नंदन, चंदामामा और शायद चम्पक या ऐसी कोई और. बांग्ला में सत्यजित राय के दादाजी की पत्रिका कल्लोल बहुत लोकप्रिय हुई और श्री राय ने अपने पूर्वजों की विरासत को जारी रखते हुए ता-जिंदगी स्वयं कल्लोल का संपादन किया.आपको मालूम ही होगा की रविन्द्र नाथ टेगोर की "बर्णमाला" जो छंद रूप में रचित की गयी थी आज भी बंगाल में लोकप्रिय है. मैंने बचपन में बंगाल में पढाई की थी सो इस बर्णमाला की एक तुकबंदी मुझे आज तक याद है . "वृष्टि पोरे टापुर-टुपुर नोदी ते एलो बान शिब थाकुरेर बिये होलो तीन कोन्येदान"

के द्वारा:

राजीव जी, इस दौर के बेहद संजीदा शायरों में अपना अलग मुकाम रखने वाले गुलजार साहब की शायरी वास्तव में कमाल की है और उन से संवाद पर आधारित आप का आलेख वाकई एहसास को रोशन करने वाला है. गुलजार जी न केवल शायरी अपितु भावनाओं के स्तर पर भी उत्कृष्ट हैं. पर उनका यह कहना की गुरुदेव टैगोर की काव्यात्मक कहानियों पर कोई काम नहीं हुआ, कदाचित भवानी शंकर मिश्र जी, रामधारी सिंह दिनकर जी, प्रेम शंकर जी, हंस कुमार तिवारी जी और प्रभाकर माचवे जी सहित तमाम अन्य साहित्य साधको के प्रयासों को अनदेखा करना है. निर्विवाद रूप से गुरुदेव टैगोर की कृतियों पर अभी बहुत काम होना बाकी है. आप का यह आलेख गुलजार साहब के लाखों चाहने वालों के दिलो को आह्लादित करने वाला है. आप की लेखनी यूं ही चलती रहे, शुभकामनाएं, बधाईयाँ...... संजय पाठक, राष्ट्रीय सहारा, गोरखपुर.

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

राजीव जी गुलजार जी से संवाद प्रीतिकर लगा। पूरी बातचीत में स्‍वयं के करने का भाव कहीं भी गुलजार में नहीं दिखा। पर एक बात जरूर गुलजार जी से कहेंगे कि टैगोर के सम्‍पूर्ण साहित्‍य का पेटेंट करने वाले कितने जिम्‍मेदार हैं। 60 वर्षों तक बंगला साहित्‍य (विश्‍वभारती) की कैद में रहे टैगोर के साहित्‍य पर हंसकुमार तिवारी, भवानीप्रसाद मिश्र, दिनकर, प्रभाकर माचवे के कार्यों को दष्टि न देना कहीं न कहीं गुलजार जी की आंखों पर फिल्‍मी चश्‍में का प्रभाव है। टैगोर का सम्‍पूर्ण काव्‍यात्‍मक साहित्‍य भारतीय मिथकों से ही लिया गया है। बात चाहे सूरदास, नल दमयंती या फिर पुरुरवा की ही क्‍यों न हो। भाई, कभी प्रासादों से बाहर निकलकर मेरे गांव आयें गुलजार जी तो कई ऐसे उपेक्षित/अनादरित रचनाधर्मी मिलेंगे जिन्‍होंने साहित्‍य को तो बहुत कुछ दिया पर हमने उन्‍हें पहचान देने में भी कोताही की। फिर भी घटना का स्‍थान साहित्‍य को दिये जाने के लिए बधाई स्‍वीकारें।

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

ओझा जी गुलजार मुझे भी बहुत अच्‍छे लगते हैं। पर हालिया रिलीज सिनेमा इश्किया के लिए उन्‍होंने एक गाना लिखा- इब्‍नेबतूता पहन के जूता,,,,,,,,,,,, दरअसल यह सर्वेश्‍वर दयाल सक्‍सेना की एक मशहूर कविता है और उसमें कुछ शब्‍द बदलकर उन्‍होंने अपने नाम से कर लिया। सर्वेश्‍वर दयाल सक्‍सेना की रचना पर अपना अधिकार जमा लिया। गुलजार पर ऐसे कई आरोप लगे। उनका निजी जीवन भी विवादों से घिरा रहा। आपको राखी गुलजार की वेदना पता होगी। खैर उनके स्‍याह पक्ष पर मैं कुछ भी नहीं कहना चाहता। हम लोग तो अच्‍छी चीजें देख रहे हैं। आपको अयोध्‍या में उनकी इब्‍नेबतूता की रचना के बारे में पूछना चाहिये था। इस गाने को लेकर वे सवालों के कटघरे में चल रहे हैं। दिलचस्‍प यह कि इश्किया सिनेमा गोरखपुर को लेकर बना है।

के द्वारा:

के द्वारा: मुकेश पाण्‍डेय मुकेश पाण्‍डेय




latest from jagran